हूल दिवस क्यों मनाया जाता है – आंदोलन शुरू क्यों हुआ,हूल क्रांति दिवस

नमस्कार मित्रो मैं सुधीर कुमार हिन्दटैग.कॉम में आपका स्वागत है आज हम आपको ”हूल क्रांति दिवस”के बारे में बताने वाले आज के इस पोस्ट में हूल दिवस (Hul Diwas) क्यों मनाया जाता है ,आदिवासियों ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया,आंदोलन क्यों हुआ,आंदोलन की शुरुआत कब हुई,आंदोलन का परिणाम क्या हुआ? ये सब विषयों की जानकारी दी जाएगी तो आइये जानते है हूल दिवस के बारे में .

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हूल दिवस क्यों मनाया जाता है ?

हूल दिवस (Hul Diwas) : जिस दिन झारखंड के आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाकर उनके समक्ष युद्घ का एलान किया यानी विद्रोह किया, उस दिन को ‘हूल क्रांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इस युद्ध में लगभग 20 हजार आदिवासी समुदाय के योद्धाओं ने अपनी जान दी ।

आदिवासियों ने विद्रोह का झंडा बुलंद किया

आजादी की पहली लड़ाई तो सन 1857 में मानी जाती है, लेकिन झारखंड के आदिवासियों ने 1855 में ही विद्रोह का झंडा बुलंद किया था। 30 जून, 1855 को सिद्धू और कान्हू के अगुवाई में मौजूदा साहेबगंज जिले के भगनाडीह गांव से विद्रोह शुरू हुआ था। सिद्धू ने नारा दिया था, ‘करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो’

आंदोलन क्यों हुआ

झारखंड संथाल परगना का इलाका बंगाल प्रेसिडेंसी के अधीन पहाड़ियों एवं जंगलों से घिरा क्षेत्र था। इस क्षेत्र में रहने वाले पहाड़िया, संथाल और अन्य निवासी खेती-बाड़ी करके जीवन-यापन करते रहते थे और अपने जगह जमीन का राजस्व किसी भी कंपनी को नहीं देते थे। ईस्ट इंडिया कंपनी अपने लगान राजस्व को बढ़ाने के लिए उन पहाड़ियों पर रह रहे आदिवासियों से जबरन लागत वसूलने का कार्य प्रारंभ कर दिया। अब उन सभी को लगाम चुकता करने के लिए साहूकारों से कर्ज लेना पड़ रहा था। और साथ ही साथ कई अत्याचार का भी सामना करना पड़ रहा था। जिससे उनकी भावना आहत हो गई। सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव चारों भाइयों ने लोगों के इस भावना को आंदोलन में बदल दिया।

आंदोलन की शुरुआत कब हुई

30 जून, 1855 को 400 गांवों के करीब 50 हजार आदिवासी भगनाडीह गांव पहुंचे और इस हुल क्रंति का यह आंदोलन शुरू हो गया। इसी सभा में यह घोषणा कर दी गई कि वे अब कोई भी राजस्व का मालगुजारी नहीं देंगे। इसके बाद अंग्रेजों ने, सिद्धू, कान्हू, चांद तथा भैरव- इन चारों भाइयों को गिरफ्तार करने का आदेश जारी कर दिया। आपको जानकर हैरानी होगी कि जो दरोगा उन चारों भाइयों को गिरफ्तार करने वहां गया उसका गर्दन संथाली यों ने काट दिया। इस कारण सरकारी अधिकारियों में भी इस आंदोलन को लेकर भय पैदा हो गया था।

आंदोलन का परिणाम क्या हुआ?


अंग्रेजों ने संथाली वासियों के आंदोलन को दबाने के लिए वहां पर बड़ी सेना भेज दी और बहुत ही मात्रा में लोगों को गिरफ्तार किया गया साथ ही साथ विद्रोह में शामिल कई लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश दे दिया गया। आंदोलन कितना बड़ा हो गया कि इसे नियंत्रित करने के लिए मार्शल लॉ लगा दिया गया।आंदोलनकारियों की गिरफ्तारी के लिए अंग्रेज सरकार ने पुरस्कारों की भी घोषणा की थी। बहराइच में अंग्रेजों और आंदोलनकारियों की लड़ाई में चांद और भैरव शहीद हो गए। प्रसिद्ध अंग्रेज इतिहासकार हंटर ने अपनी पुस्तक ‘एनल्स ऑफ रूलर बंगाल’ में लिखा है, ‘संथालों को आत्मसमर्पण की जानकारी नहीं थी, जिस कारण डुगडुगी बजती रही और लोग लड़ते रहे।’ जब तक एक भी आंदोलनकारी जिंदा रहा, वह लड़ता रहा। इस युद्ध में करीब 20 हजार आदिवासियों ने अपनी शहादत दी थी। सिद्धू और कान्हू के करीबी साथियों को पैसे का लालच देकर दोनों को भी गिरफ्तार कर लिया गया और फिर 26 जुलाई को दोनों भाइयों को भगनाडीह गांव में खुलेआम एक पेड़ पर टांगकर फांसी पर लटका दिया गया।इस तरह सिद्धू, कान्हू, चांद और भैरव, ये चारों भाई सदा के लिए भारतीय इतिहास में अपना नाम अमर कर गए।

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