बीत रही को संवरने दे – हिंदी गीत, Hindi geet

बीत रही को संवरने दे – हिंदी गीत

बीत रही को संवरने दे - हिंदी गीत
बीत रही को संवरने दे – हिंदी गीत

अभी शेष हैं कई वसंत
विश्वास धरा पर धरने दे
तन का धर्म निबाहे तन
मन को मन की करने दे

स्मृतियों की मंजूषा से
चीह्न चीह्न वो बीते दिन
घटी पहर अहोरात्र
उड़-उड़ जाते ज्यों पलछिन

कटि यदाकदा अधर
सख्यसखा ठहरने दे
तन का धर्म निबाहे तन
मन को मन की करने दे . . .

मनमृदंग मतवारा हाथी
ढीले तनवीणा के तार
गजरे शब्दपुष्पों के इधर
उधर से हों चितवन के वार

जगतहाट में प्रणयविनय
मुक्तव्यौपार पसरने दे
तन का धर्म निबाहे तन
मन को मन की करने दे . . .

सप्तपदी की हे देवि
तुमरा शासन आठों याम
मिलनमधु बरसा बहुत
अभी शेष गुठली के दाम

देहसीमा के पार उतर
चिरअभिलाष विचरने दे
तन का धर्म निबाहे तन
मन को मन की करने दे . . .

चौकाबासन देस पराया
धन-अर्जन की छूटी प्रीत
ऊंचनीच थी जहां-जहां
संतानों को सौंपी सीख

बीत गई सो बीत गई
बीत रही को संवरने दे
तन का धर्म निबाहे तन
मन को मन की करने दे . . .

उषाकाल वंदन अभिनंदन
सांझसमय की ढलती धूप
सुखदा निर्मल कोकिलकंठी
मनहर मनहर नाभिकूप

वायुसम तीव्र वयगति
उल्लासध्वजा फहरने दे
तन का धर्म निबाहे तन
मन को मन की करने दे . . .

रजतवर्ण हुईं केशावलियां
आनन अनुभवछाप लगी
मुंदे-मुंदे से नयन तृषा के
कामकुंवरि जगी-जगी

अपने में व्यस्तअस्त सब अपने
संगरोध कतरने दे
तन का धर्म निबाहे तन
मन को मन की करने दे . . . !

विशेष कथन : तन ढल रहा परंतु, मन अभी युवा-युवा। अपनी जीवनसंगिनी से यही कह रहा है पुरुष।

गीत में भाषा की शुचिता व शुद्धता का इस प्रकार निर्वहन हुआ है कि वे लोग मौन हैं जो कहते थे कि हिंदी में गीत अथवा प्रेमगीत अरबी-फारसी शब्दों के बिना आज संभव नहीं है।

आपकी टिप्पणी का स्वागत है।

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