मणियां हिंदी कविता | Hindi Kavita, poet

मणियां – हिंदी कविता

मणियां हिंदी कविता Hindi Kavita
मणियां हिंदी कविता

मन विकल उदास बहुत परों के बिना
स्वप्नपरिंदे उल्टे लटके घरों के बिना

जनमते हैं मरने को गईया के पूत आज
कैसी होगी कल धरा हलधरों के बिना

पुलों के ऊपर पुल पुलों की भूलभुलैया
जीना नहीं जीना यहां करों के बिना

मल्ल धनुर्धर ज्ञानी अज्ञानी आये गये
सुपथ गरल सा लगे सहचरों के बिना

भारत के पांव में कसी जातिधर्म बेड़ियां
कुंठित खंडित मेधा अवसरों के बिना

कल्याणहित पिले पड़े पंच सरपंच सभी
मणियां दमकेंगी निश्चित विषधरों के बिना

सिसक रहा वाद्यवृंद कैसा यह राग है
हंसता कोकिल पुजता कागा सुरों के बिना

हे अयोध्या के राजा भेजो तो हनुमंत को
मनमलेच्छ माने नहीं वृक्षों पत्थरों के बिना

पाठकगण, लेखकों की रचनाओं पर आपकी प्रतिक्रिया न केवल हमें उत्साहित करती है अपितु, श्रेष्ठ लेखन आप तक पहुंचाने का यह प्रेरणास्रोत भी है।
गीतिका ‘मणियां’ पर आपके विचार आमंत्रित हैं।
धन्यवाद !

कवि – वेदप्रकाश लाम्बा

आप इसे भी पढ़े बेदाग दिल नगीना – हिंदी कविता

यहाँ से रेटिंग दें post

Leave a Comment